झोपड़पट्टी में रहने पर मजबूर हैं मजदूर गरीबों के सुनने वाला कोई नहीं
हमारे देश भारत की आजादी के 74 वर्ष बीत जाने के बाद भी कई ऐसे राज्य हैं जो अभी भी विकास से कोसों दूर हैं ऐसा ही विकास में तेजी लाने के लिए बिहार से अलग हुए झारखंड राज्य के 20 साल बीत जाने के बाद भी वहां के मूल निवासी जंगलों में रहने वाले आदिवासी आज भी आधारभूत संसाधनों से कोसों दूर हैं जिन्हें रहने के लिए अभी तक घर नहीं दिया जा सका है वहां पर सड़क बिजली पानी इत्यादि चीजों की कल्पना करना भी उनके साथ धोखा करने जैसा होगा।जंगलों से घिरा हुआ सुदूरवर्ती गांव डाडी घाघर मैं रहते हैं परिवार 6 बच्चों को छोड़कर मजदूरी करने चले जाते हैं पति और पत्नी सांप बिच्छू व जंगली जानवरों का लगा रहता है भय मुखिया जी के घर चक्कर लगाते लगाते थक गए हैं गरीब मजदूर।
क्या है पूरा मामला?
इचाक: प्रखंड मुख्यालय से दूरी लगभग 26 किलोमीटर जंगलों एवं पहाड़ों से घिरा सुदूरवर्ती गांव डाडी घाघर पंचायत के डाडी घाघर गांव में लगभग 6 वर्षों से जागेश्वर गंझु पिता रति गंझु झोपड़पट्टी में रहने का है मजबूर। वहीं पीड़िता का कहना है कि हमारे मिट्टी का घर टूटे काफी दिन हो गया एवं हम अपने घर परिवार बच्चे को लेकर किसी दूसरे जगह में कुरहा व गुफा बनाकर अपने बच्चों का एवं अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं, जो काफी जंगली जानवरों एवं बिच्छू से डर बना रहता है की हमारे परिवार पर आक्रमण ना कर दे। बच्चे को गुफा में छोड़कर हम दोनों पति पत्नी मजदूरी करने के लिए चले जाते हैं जब शाम को घर आते हैं देखते हैं और देखते हैं कि हमारे बच्चे सलामत हैं तो दिल में तसल्ली मिलती है कई बार मुखिया के घर भी चक्कर लगाया लेकिन मुखिया सिर्फ आश्वासन ही देते रहा । लेकिन लगभग 6 साल गुजर गया अभी तक हमारा घर नहीं बन पाया है जो बरसात के दिनों में रात में नींद नहीं पड़ती है पानी हमारे गुफा में घुस जाता है जिसके कारण रात में जगे रहते है, सो नहीं पाते हैं। अगर हमारा मकान शीघ्र नहीं बनाया गया तो कभी भी किसी तरहा से हादसा हम पर हो सकता है। वहीं भाजपा के भाजयुमो जिला कार्यालय मंत्री नंदू मेहता ने कहा कि पंचायती राज्य होते हुए भी इस तरह से परिवार कुरहा- गुफा मेरा रहे यह दुर्भाग्य की बात है। इसे सरकार को संज्ञान में लेते हुए ऐसे परिवार को अतिशीघ्र आवास देने का काम करें इस *संबंध में मुखिया सुमन देवी* व मुखिया प्रतिनिधि राजेंद्र गंझु ने कहा कि लिस्ट में नाम नहीं है इसके कारण से आवास नहीं बन पा रहा है आवास बनने के लिए नाम भेजा गया जैसे ही आएगा आवास गरीब परिवार को बना दिया जाएगा।
सिर्फ आश्वासन देने और फोटो पब्लिसिटी के लिए आते हैं अधिकारी और नेतागण।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार अधिकारी आते हैं, और सिर्फ आश्वासन देकर और अपनी पब्लिसिटी के लिए फोटो खिंचवा कर चले जाते हैं। पर जमीनी स्तर पर अभी तक हमारे हालातों में सुधार लाने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया गया है। साथ ही साथ आपको बताते चलें की बीते कुछ सप्ताह पहले ही हजारीबाग डीडीसी ने क्षेत्र का भ्रमण किया था ।और ग्रामीणों को कई आश्वासन भी दिए थे जिसे लेकर ग्रामीणों में कई सारे विकास के अरमान जागे थे परंतु किसी भी प्रकार का ठोस कदम नहीं उठाने पर उनका विश्वास टूटता जा रहा है। उनका कहना है कि अब आश्वासन की आदत सी पड़ गई है जहां अधिकारीगण आते हैं और एक कपड़ा और 5 किलो चावल देख कर और अपनी वाहवाही बटोर ते हैं और हम वैसे ही जिंदगी बिताने को मजबूर होते हैं।
पंचायत प्रतिनिधि भी नहीं लेते हैं कभी सुध।
ग्रामीणों का कहना है कि पंचायती राज व्यवस्था होने के बाद भी सुदूरवर्ती इलाकों में कोई भी प्रतिनिधि सुध लेने के लिए भी नहीं आते हैं उनका कहना है कि जब चुनाव आता है तो वोट लेने के लिए तो आते हैं मगर उसके बाद कभी यहां की हालात देखने के लिए कोई नहीं आता नहीं अभी तक उनके और से विकास को लेकर कोई पहल नहीं किया गया है।


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